Dasbodh Hindi Pdf

स्वस्वरूपी मिळाले । अव मिळोनि एकवि शाले। देहाती बस्तु १३ पम जाী नये सुने। यह गाना अधिक उम । बे नाविक में सुणे देह- बुदीचे॥॥१॥.
देहतु डा निम्रय मरी पमाचानाचा क्षय । चुके खमाचान- समय । देवताओं ॥३३॥ हाये में थोरपण । तेंचि देहबुद्धी लक्षण । मिथ्या जाणून विलक्षण । निंदिया देह ॥३४॥.
देह पावे अंधवरी सरण । चचरी घरी देहाभिमान । पुन्हा दाखवी पुनरागमन] गाइड मागुती ॥३५॥ देहचेनि थोरपणें समाधानासि आाणिे उ । देह पडेल कोण्या गुणे हेंदि कजेना ।३॥ ॥.
हिव आाहे देहातीते । म्हणोनि निरू पिती संत। देहबुडीने अनहित होऊेचि लागे । ३७॥ सामर्थ्यबळे ३हबुबी । योधियांस सेहि दादी । देइदुदची उपाधी 1 पेसाब लागे ॥ ३८ ॥.
म्हणे देखबार झडे । तरीच परमार्थ घडे। देहड़दीनें विवडे । ऐक्य- ता अ्रमहाची ॥३९ ॥ चिवेक वस्क्कदे योटी । देइत्रादि तेथ नि पाडी । अहंता लावूनि निवडी । बेगळेप्णे ॥ 9० ॥.
म्हणे प्रम्ह एकचि असे । परी ते बहुविध भासे। अनुभव देही अनारिसे । नानामती ॥ १३ ॥ जया अनुभव लें। तेंचि तयासि नानले । तेधेचि स्वाचे विश्रासलें। अंतःकरण।।४४॥.

दासबोध : समर्थ रामदासस्वामी द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – ग्रन्थ | Dasabodh : by Samarth Ramdas Swami Hindi PDF Book – Granth

श्री दासबोध – Shri Dasbodh Book/Pustak PDF Free Download

शून्य आणि सनातन। सर्वेश्वर बाणी सर्वज्ञ। सर्वल्मी जगजी बन । ऐसी नामे ॥ १८ ॥ सहजे आणि सोदित । युद्ध बेत सैवतित । शाश्वत आणि शहदिति । सेकसी म्हणे देखबार झडे । तरीच परमार्थ घडे। देहड़दीनें विवडे । ऐक्य- ता अ्रमहाची ॥३९ ॥.

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टाकली में तपश्चर्या | ८जगल मे च्छे गये । उनके ज्येष्ठ बन्धु बहुत समन्ना-वुन्चाकर उन्हें घर ले आये !उनकी यह चारु देख कर माता राषूबाईं को बड़ी चिन्ता हुई । श्रेष्ठ अपने कानष्ट बन्धुनारायण की विरक्ति देख कर पहले ही समझ गये थे कि यह विवाह नहीं करना चाहता ।उन्होंने अपनी माता को बहुत श्रकार से समझाया; पर वै बार बार यह कहतीं कि नारायणःका विवाह अवद्य होना चाहिए । अवसर पाकर एक दिन साता राणूबाई अपने नारायण.करो एकान्त स्थान में ठे गई ओर सुख पर हाथ फेर कर, बड़े लाइ-प्यार से बोलीं, ^“ बेटा,.तू मेरा कहना सानता है या नहीं ? बाङ्के समथै ने उत्तर दिया, “ मातु्री, इसके स्थिक्या पूछना है? आपका कहना न मानेंगे तो मानेंगे किसका ? कहा भी है, न मातुः प्र.देवतम्‌ , ` यह सुन कर माता राणूबाई बोलीं, “' अच्छा तो विंवाह की बात चलने पर तू.ऐसा पागलपन क्यों करता है १ तुन्न मेरी शपथ दै; * अन्तरपट ” पकड़ने तक तू. विवाह कलिए इन्कार न करना । ” माता करी यह बात सुन कर समर्थ बड़े विचार में पढे । कुछ देरतक्र सोच-विचार कर उन्होंने उत्तर दिया, ” अच्छा, अन्तरपट पकड़ने तक में इन्कार नकरूँगा । *' भोाली भाली बिचारी माता ! समथ के दाँव पेंच उसे केसे मादम होते ! राणूबाईने समझ लिया कि लड़का विवाह करने के लिए तैयार होगया । उन्होंने जब यह बात अपने बढ़ेपुत्र श्रेष्ठ से बतलाई तब वे कुछ हूँसे और प्रकट में सिफ इतना ही कहा, ' क्यों न हों! ”जब देखा गया कि लड़का विवाह करने के लिए राजी हैं तव सब की सम्मति से एकंकुरीन ओर प्राचीन सभ्बन्धी कुरु की कन्या से विवाह निश्चित किया गया । लम्तिथि केदिन श्रेष्ठ सारी बरात लेकर, बडी धूमधाम के साथ कन्या के पिता के यहाँ पहुँचे । सब केसाथ समथ भी आनन्दपूवैक गये 1 सीमान्तवूजन , पुण्याहवाचन आदि ल्य्विधि होते समयश्रेष्ठ और समये, दोनों भाई, आपस में एक दूसेरे की ओर देख कर, मन्द्‌ मन्द्‌ हँसते जाते.थे | कुछ समय के बाद अन्तरपट पकड़ने का अवसर आया । ब्राह्मणों ने मंगलाइ्क पढ़नाप्रारम्भ किया । सब ब्राह्मण एक साथ ही * सावधान ” बोले । समर्थ ने सोचा कि मैंसदा सबेदा सावधान रहता हूँ; फिर भी ये छोग *' सावधान, सावधान ' कहते ही हैं; इसलिए इस शब्द में अवस्य कुछ न कुछ भेद होना चाहिए । मातुश्री कीं आज्ञा भी अन्तरपटपकड़ने तक की ही थी । वह भी पूर्ण हो गई । में अपना वचन पूरा कर चुरा । अब मेंयहाँ क्यों बैठा हूँ ? मुझे सचमुच सावधान होना चाहिए--इस प्रकार मन में विचार करके.समथ एकदम लम्रमण्डप से उठ कर भगे | कई लोग उनके पीछे दौड़े; पर॒ वे हाथ नहींआये । इघर लममण्डप में बडा शोर-गुल मचा | कुछ शान्ति होने पर, ब्राह्मणों ने लड़की कादूसरा विवाह कर देने के लिए शाल्राघार दिंखलाकर सम्मति दी । समय के भगने का हालजब उनकी माता को साल हुआ तब वे बहुत दुःखित हुई । श्रेष्ठ ने उनका समाधान कियाओर कदा करि, “ आप को$ चिन्ता न करें । नारायण कहीं न कहीं आनन्द से रहेंगा। मैं पहलेदी कहता था कि उसके विवाह के प्रबल में न पड़ों । अस्तु; जो हुआ सो हुआ | ”'”टाकली में तपश्चयां ।विचाह समय से सावधान होकर समये पहले दो चार दिन अपने गाँव जाँब की पंचवटी